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किस्से पार्किंसंस के # १३ शोभना ताई

Updated: Feb 25

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अपने पिछले एक किस्से में मैंने कहा था कि कम्पन ना होने वाले पार्किंसंस मरीज़ों के लिए पार्किंसंस का निदान करना काफी मुश्किल होता है।   हम उस बारे में बात ज़रूर करेंगे लेकिन उस से पहले पार्किंसंस के निदान के बारे में बात करना ज्यादा ज़रूरी है।  

 

पार्किंसंस के निदान के लिए कोई एक टेस्ट नहीं है।  जैसे मधुमेह (diabetes ) रक्त चाप ( blood pressure ) के लिए यन्त्र होता है लेकिन पार्किंसंस के लिए कोई यन्त्र नहीं है।   इसलिए, निदान की प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली है और परीक्षण में त्रुटि की संभावना है।  कई बार मरीज़ के लक्षण इतने स्पष्ट होते हैं कि डॉक्टर बिना किसी हिचकिचाहट के पार्किंसंस का निदान कर सकते हैं।  अश्विनी विरकर को २००१ में पार्किंसंस का निदान हुआ, उस समय उसका बेटा सिर्फ एक वर्ष का था।  पहली बार जब न्यूरोलॉजिस्ट ने पार्किंसंस होने की बात स्पष्ट की तब उसे इस निदान पर विश्वास नहीं हुआ।  उसने कई हस्पतालों के नामचीन न्यूरोलॉजिस्टों की राय ली लेकिन उसके लक्षण इतने स्पष्ट थे कि  सब  पार्किंसंस को लेकर एक मत थे।  मुझे लगता है कि डॉक्टरों के निदान पर अविश्वास से ज्यादा उसे कहीं ये उम्मीद थी कि शायद एक डॉक्टर कह दे कि उसे पार्किंसंस नहीं है।  पर वह नहीं हुआ। 

 

मेरे पति के मामले में भी हमारे पारिवारिक डॉक्टर ने तुरंत निदान किया और हमें एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास भेज दिया।  हमारे पास न्यूरोलॉजिस्ट के लिखे हुए पेपर के अलावा इनके पार्किंसंस से पीड़ित होने का कोई और कोई साबुत नहीं हैं।  कुछ लोग हमसे पूछते है कि,"क्या आपका MRI नहीं किया गया , हमारा तो किया था।" और अगर बिना MRI के पार्किंसंस का निदान किया जा सकता है तो डॉक्टर ने हमारा क्यों किया।  डॉक्टर बेवक़ूफ़ बनाकर पैसे लूटते हैं ऐसी धारना उनके मन में घर कर लेती है।  ऐसे आरोप लगाने से पहले हमें वास्तिवक्ता का ज्ञान होना चाहिए।  

 

 PD की अनुपस्थिति को साबित करने के लिए MRI मस्तिष्क परीक्षण नहीं है।  MRI से कही ये ट्यूमर तो नहीं? कहीं ये ब्रेन स्ट्रोक तो नहीं ? जैसे प्रश्नों की पुष्टि होती है।  केवल उन्हीं लोगों की जांच की जाती है जिन पर डॉक्टरों को इसका संदेह होता है और PD का निदान केवल तभी किया जाता है जब मस्तिष्क में कोई और समस्या ना हो।

निदान में एक और कठिनाई यह है कि पार्किंसंस के समान लक्षणों वाली अन्य बीमारियां भी हैं , जैसे कि बुढ़ापा , थकान , मस्तिष्क के हलके  स्ट्रोक, धीमी चाल , संतुलन का खोना आदि। 

पार्किंसंस के कुछ शुरूआती लक्षणों में कंपकंपी , धीमी शारारिक गतिविधियां , जिस्मानी अकड़न शामिल हैं।  ये लक्षण होने से निदान भी जल्दी होता है।  पार्किंसंस के कई लक्षण ऐसे है जो जल्द ध्यान में नहीं आते जैसे कब्ज़ , अवसाद , बेचैनी , संतुलन की कमी , आँखें खोलने में असमर्थता , लार आना ,दर्द।, लिखावट में बदलाव, चक्कर आना।  कई बार शुरुआत इन लक्षणों से होती है।  कुछ समय पश्चात् और लक्षण नज़र आने पर समझ आता है कि ये पार्किंसंस है।  ( लक्षणों की ये सूची देखकर घबराये नहीं ,हर किसी में ये सारे लक्षण नज़र नहीं आते) अब ये सभी माध्यमिक लक्षण सामान्य लोगों में देखे जा सकते हैं। यहीं पर न्यूरोलॉजिस्ट के ज्ञान और अनुभव की परीक्षा होती है। 

अगली बातचीत में हम ऐसे द्वितीयक लक्षण से रोग की शुरुआत के उदहारण देखेंगे।  यह जानकारी विशेषज्ञों के व्याख्यानों , पार्किंसंस के बारे में पढ़ने से जो समझ आया उसपर आधारित है।  Source: Originally published in Marathi on Parkinson’s Mitra

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