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किस्से पार्किंसंस के # ९ शोभना ताई



कहते हैं पार्किंसंस वृद्धों की बिमारी है।  ये सही है कि पार्किंसंस क्लिनिक में ज्यादातर मरीज़ वृद्ध ही होते हैं।  पर पार्किंसंस मित्रमंडल में काम करते हुए हमे छोटी उम्र में पार्किंसंस से पीड़ित भी काफी मिले।  गूगल पर पार्किंसंस के सन्दर्भ में जो तस्वीर दी है वो भी एक वृद्ध की ही है।  श्री चाड वॉकर नमक व्यक्ति की पत्नी को उम्र के ३० वे दशक में ही पार्किंसन हो गया था।  इस लिए गूगल का ये चित्र बदला जाए ऐसा अभियान श्री वॉकर ने शुरू किया है।  उनका मानना है कि ये चित्र देखकर लोगों के मन में ये धारणा घर कर गयी है कि केवल बड़ी उम्र वालों को ये रोग होता है।   जबकि छोटी उम्र में पार्किंसंस होने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।  

 

पार्किंसंस मित्रमंडल के काम करते हुए मुझे जो सब से कम उम्र की पीड़िता मिली वो थी बारह वर्षीय मंजुला झगडे।  मेरी मुलाकात उस से आनंदवन में हुई।  आनंदवन में हर कोई एक सामान्य जीवन जीता है फिर चाहे वह कुष्ट रोगी हो , अपंग हो या फिर दृष्टिहीन।   वहाँ पहुँच कर हर शख्स को आनंदमये जीवन जीने की आदत हो जाती है।  ये मंजुला , सिलाई विभाग में कार्येरत है।  अब वो ३० वर्ष की है।  उसे देखकर ये एहसास ही नहीं होता की वो इतने वर्षों से पार्किंसंस से पीड़ित है।  वो एक मस्त जीवन जी रही है।  उसे अपनी बिमारी के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं है। 

 

उसके बाद काफी ऐसे लोगों से मिलना हुआ। अमिता गोगटे को ३० वर्ष की उम्र में पार्किंसंस हुआ।  जब हमने शुरुआत में पार्किंसंस पीड़ितों से मिलने उनके घर जाने शुरू किया था , तब उनसे मुलाकात हुई थी। वो मित्रमंडल में नहीं आती , वैसे उसे ज़रूरत भी नहीं पड़ती।  उसके परिवार वालों ,पीहर और सुसराल वाले दोनों ने , और  पति ने उसे पार्किंसंस के साथ ख़ुशी से रहने में काफी मदद की।  उस समय अमिता का बेटा सिर्फ १ वर्ष का था।  अब तो वो बड़ा हो गया है , नौकरी करता है।  उसके बच्चे भी उसका बहुत ध्यान रखते हैं।  गृहणी होते हुए भी इन्हीं कारणों से वे एक उत्तम जीवन जी रही है।  उसकी थलमोटोमी नमक शस्त्रक्रिया हुई है।  ये सर्जरी पहले की जाती थी अब ये अप्रचलित है।  मैं उससे कई बार मिलने गयी हूँ। 

 

श्री सुधीर वकील ये नागपुर के एक शुभार्थी हैं।  उनका बेटा पुणे में रहता है , इस कारण वे अक्सर सभा में आते हैं।   उन्हें भी  ४० वर्ष पूर्व काफी कम उम्र में पार्किंसंस हो गया था।  वे बैंक में कार्येरत थे , वे अपनी नौकरी काफी अच्छी से कर पाए।  उनकी उपरोक्त बतायी गयी  थलमोटोमी सर्जरी तो हुई ही थी , लेकिन जब वे पहली बार सभा में आये तब उनकी D B S  सर्जरी को भी लगभग ग्यारह -बारह वर्ष हो चुके  थे।  उन्होंने नौकरी से थोड़ा पहले ही VRS लिया था।  वैसे ही जैसे अक्सर बैंक कर्मचारी लेते हैं।  अर्थात पार्किंसंस के कारण काम ना करना पाना ये वजह नहीं थी।  

 

हमारे यहाँ श्री बी के चौगले नामक एक शुभार्थी हैं।  वे शिक्षक पद से समूह शिक्षा अधिकारी के पद तक पहुंचे।  उन्हें भी काफी कम उम्र में पार्किंसंस हुआ था।   एक बार उनका ट्रांसफर सांगली किया गया ,  उनका प्रमोशन होना था। अक्सर लोग ट्रांसफर टालने के लिए बिमारी का बहाना बनाकर प्रमोशन लेने से इंकार कर देते हैं , लेकिन श्री चौगले ने ऐसा नहीं किया।  उन्होंने ट्रांसफर स्वीकार कर अपना काम बखूबी निभाया , जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।   इसके बाद वह नौकरी का कार्यकाल पूर्ण कर सेवा निवृत्त हुए। 

 

हमारी रेखा आचार्य भी ऐसी ही एक महिला है।  उन्हें सैंतालीस की उम्र में पार्किंसंस हुआ।  MIT में मराठी एवं अंग्रेजी दोनों माध्यमों की बालवाड़ी स्थापित करने में उनका बहुत बड़ा हाथ था। वे  भी अपना कार्यकाल पूर्ण कर २००५ में सेवा निवृत हुई। 

 

इन सभी शुभार्थियों को देखकर उनकी अवस्था हम समझ सकते हैं।   इसका अर्थ ये नहीं कि बहुत ही सहजता से सारे काम कर लेते हैं और उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती।  लेकिन अगर मन में ठान लो तो इस पर काबू पाया जा सकता है।  इसका बहुत बड़ा उदहारण है श्री उमेश सालगर। वे आज भी न्यू इंडिया अश्योरेंस में कार्येरत है और उसपर उनको काम के सिलसिले में अक्सर टूर्स पर जाना पड़ता है।  ऑडिट करने लिए वे अलग अलग जगह जाते है।  और तो और  उन जगहों में जाकर वे पार्किंसंस मित्रमंडल के काम भी करते हैं।  कुछ समय पूर्व उन्हें काम के सिलसिले में जमशेदपुर जाना पड़ा।  जमशेदपुर जाने के लिए उनके डिपार्टमेंट से कोई भी तैयार नहीं था , ऐसे में श्री सालगर गए और वो काम निपटा आये।  वे अक्सर निंबध स्पर्धाओं में भी हिस्सा लेते रहते है।  अर्थात पार्किंसंस होने के कारण वे कहीं काम में कटौती नहीं करते। 

 

अब बात करते है श्री वासु की।  उनके पिता भी पार्किंसंस से पीड़ित थे, आगे चलकर श्री वासु को भी कम उम्र में पार्किंसंस हो गया।  उनका बहुत बड़ा कारोबार है।  उनकी DBS सर्जरी हुई है।  जिन्हें हम अनिश्चिक हरकते कहते है उन्हें बहुत होती थी , DBS सर्जरी के बाद वे पूरी तरह से रुक गयीं।  जब हम उनसे मिलने उनके घर गए तब उन्होंने सर्जरी से पहले और सर्जरी के बाद के दोनों वीडियो हमे दिखाए। अब वे बहुत अच्छी तरह से अपना व्यवसाय चला रहें हैं। 

 

ऐसे कितने की उदहारण हम आपके सामने पेश कर सकते हैं।  इस लिए कम उम्र में पार्किंसंस होने पर हार ना माने।  कई बार छोटी उम्र में बड़ा रोग होने पर उसे स्वीकार करना मुश्किल होता है  और स्वीकार ना करने इ कारण पार्किंसंस बढ़ता ही जाता है।  ये सारे उदहारण हम ही इसी कारण दे रहें हैं , ताकि अगर आप मन से दृढ़ हो तो नौकरी पेशा करने में कोई अड़चन नहीं आती।  अक्सर आसपास के लोग ही आपकी सहायता कर देते हैं, लेकिन हर बार सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

 

श्री अरविन्द वेतुरकर इन्हें नौकरी हेतु तळेगाव जाना पड़ता था।  उनका घर तीसरी मंज़िल पर था।  वे औंध में रहते थे, इसलिए पहले बस से रेलवे स्टेशन जाते फिर वहां से ट्रैन से तळेगाव अपने काम पर।  उन्होंने भी अपना नौकरी का कार्येकाल पूरा किय।  उन्हें भी पैंतीस छतीस की उम्र में पार्किंसंस हो गया था। 

 

ऐसे बहुत से उदारहण आपको दे सकते हैं।  अगर आपको भी कम उम्र में पार्किंसंस हुआ है तो ये सारे उदारहण अपने सामने रखें , नाउम्मीद ना होकर अपना मन कड़ा करें और आयी हुई कठिनाई का सामना करें , मेरा आपसे ये ही अनुरोध है। 

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