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किस्से पार्किंसंस के # ११ शोभना ताई







जिस तरह बढ़ती उम्र और पार्किंसंस जुड़े हुए हैं, उसी तरह कंपकंपी (थरकन)और पार्किंसंस भी जुड़े हुए हैं।  पहले मैं भी इसी भ्रम में थी, कि पार्किंसंस का मतलब कंपकंपी होता है।   लेकिन जब पार्किंसंस मित्रमंडल के साथ काम शुरू किया और  पार्किंसंस पीड़ितों से मिलने उनके घर जाने लगी तब मुझे बीस पचीस मरीज़ ऐसे मिले जिन्हें कंपकंपी की तकलीफ बिल्कुल नहीं थी,  तब मुझे समझ आया कि पार्किंसंस बिना कंपकंपी के भी होता है।  

 

श्री शरतचंद्र पटवर्धन लम्बे समय से पार्किंसंस मित्रमंडल के सदस्यों की लिस्ट सँभालते हैं।  कुछ सदस्यों का निधन हो जाता है, कुछ नए जुड़ते हैं , कुछ का पता या फ़ोन नंबर बदल जाता है, ये सब कार्य श्री पटवर्धन करते हैं।  लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ सदस्य आकर कहते हैं कि हमें पहले पार्किंसंस था पर अब नहीं है, इस लिए आप हमारा नाम लिस्ट से हटा दें।  ऐसे लोग मंडल की सभाओं में उपस्थित रहते हैं, दवाई लेते हैं चार पांच महीने बाद उन्हें समझ आता है कि उन्हें पार्किंसंस नहीं है।  इन सब लोगों में एक समानता थी कि उन सबको कंपकंपी की शिकायत थी।   इनमें से कुछ पार्किंसंस ना होने के बावजूद मंडल से जुड़े रहते हैं, हमें भी कोई आपत्ति नहीं होती, पार्किसंस मित्रमंडल से जुड़ने के लिए पार्किंसंस होना ज़रूरी नहीं है।  

 

इस सन्दर्भ में पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर महादेवकर जी बारे में बताना चाहूंगी।  जब उनके हाथों में कंपकंपी की शुरुआत हुई तो उन्होंने खुद से अनुमान लगा लिया  की मुझे पार्किंसंस है और हमसे जुड़ गए।  बाद में उनके फॅमिली डॉक्टर और न्यूरोलॉजिस्ट ने उन्हें बताया कि उन्हें पार्किंसंस नहीं बल्कि रायटर्स क्रैम्प है।  ये अक्सर लेखकों को होता है और सिर्फ हाथों तक ही सिमित रहता है।  शरीर के बाकी हिस्सों पर इसका कोई परिणाम नहीं होता। 

 

उसी तरह 'एसेंशियल ट्रेमर्स ' या जिसे बिन कारण बढ़ने वाली कंपकंपी भी कहते है, उसका भी पार्किंसंस से कोई सम्बन्ध नहीं होता।  इसमें सिर्फ कम्प होता है।  कहने का तात्पर्य ये कि कोई कंपकंपी पार्किंसंस है या नहीं इसका निदान सिर्फ विशेषयज्ञ  या न्यूरोसर्जन ही कर सकते हैं। ये बात ध्यान में रखें कि हर कंपकंपी पार्किसंस नहीं है।   डॉक्टरों के मना करने के बावजूद ,प्रोफेसर महादेवकर के मन में ये शंका थी कि उन्हें पार्किंसंस ही है।  लेकिन पार्किंसंस मित्रमंडल में आने के बाद उन्होंने कई व्याख्यान सुने , पार्किंसंस पर कई किताबें पढ़ी तब उन्हें विश्वास हुआ कि उन्हें पार्किंसंस नहीं है।  जब उनके एक मित्र को पार्किंसंस का निदान हुआ तब वे उनके साथ मंडल में आये। 

 

हमारे एक सभासद श्री राजकुमार जाधव का कहना था कि उन्हें उन्नीस वर्ष की उम्र से पार्किंसंस है।  उनकी माताजी भी पार्किंसंस से पीड़ित थी, अपनी माताजी को होने वाली तकलीफ देखकर , श्री जाधव ने विवाह ना करने का निर्णय लिया।  वे एक दफ्तर में चपरासी थे।  उन्होंने न्यूरोसर्जन से अपनी बिमारी का निदान नहीं करवाया, दवाइयां भी अपने हिसाब से ले रहे थे। अब वे साठ वर्ष के हैं। उन्हें कोई और लक्षण नहीं हैं , उनकी तबयीत भी ठीक है।  मुझे लगता है कि वे शायद पार्किंसंस से नहीं बल्कि एसेंशियल ट्रेमर्स से पीड़ित है।

 

पार्किंसंस के लिए कोई टेस्ट नहीं है।  रक्तचाप, मधुमेह चेक किया जा सकता है , लेकिन पार्किंसंस का कोई टेस्ट नहीं है।  पार्किंसंस का निदान सिर्फ लक्षणों के आधार पर किया जाता है। ये निदान विशेषज्ञों पर निर्भर होता है।  ये जानलेवा हो सकता है।  एसेंशियल ट्रेमर्स को अगर पार्किंसंस समझा जाए तो कोई बात नहीं लेकिन पार्किंसंस की दवा लेना शुरू कर देना गलत हो जाएगा।  इसलिए मेरी राय में हर कंपकंपी को पार्किंसंस समझा जाना गलत है।  ये पुष्टि करने के लिए कि ये कंपकंपी है या पार्किंसंस , मरीज़ की जांच न्यूरोलॉजिस्ट से करवाई जानी चाहिए।

 

अब आशा की एक नई किरण नज़र आ रही है।  हमारे यहाँ कमिंस इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ विद्यार्थी आये थे।  उन्होंने अपने एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत एक ऍप बनाया है।  इस ऍप द्वारा ये बताया जा सकेगा कि मरीज़ कंपकंपी से पीड़ित है या पार्किंसंस से।  इसके लिए एक छोटी पट्टी जैसे उपकरण का उपयोग किया जाता है।  इस पट्टी को हाथ पर लगाने पर सही निदान किया जा सकता है।  इस ऍप का प्रयोग उन्होंने पार्किंसंस मित्रमंडल के सदस्यों पर किया।  ये प्रोजेक्ट के पूर्ण होते ही ये बच्चे इसका पेटेंट भी ले लेंगे।  उनके इस प्रयत्न से पार्किंसंस का निदान सरल हो गया है। 

 

अक्सर ऐसा होता है कि हाथों में थरकन आते ही समझ लिया जाता है कि पीड़ित को पार्किंसंस है और डॉक्टर के पास जाते हैं .  दूसरी ओर, ऐसे मामले भी होते जहां कोई कम्पन नहीं होती और डॉक्टर इसकी जांच भी नहीं करते और चार पांच वर्षों बाद भी पार्किंसंस पर ध्यान नहीं दिया जाता है।  इसलिए ही मैं हमेशा कहती हूँ कि थरकन और पार्किंसंस को एक दुसरे से जोड़ कर भ्रमित ना हों।  क्योंकि थरकन नहीं तो पार्किंसंस नहीं ये मानसिकता तैयार हो जाती है , जो की गलत है।   आगे के अंकों में थरकन के बिना पार्किंसंस के कारण कौन कौनसी  समस्यां हो सकती है इस बारे में चर्चा करेंगे। 

 

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